कानपुर- फ़र्रुखाबाद रोड पर काली नदी के सुरम्य पूर्वी तट पर बसा रामाश्रम सूफ़ी संत मत का एक प्रमुखः केन्द्र है। आज विश्व विख्यात रामाश्रम श्यामनगर की स्थापना महान सूफ़ी संत श्री राम सिंहः राणा जी साहब ने की थी। मूलतः रामाश्रम सूफ़ी मत की नक़्शबन्दिआ परम्परा पर आधारित है। रामाश्रम सतसंग का मूल सिद्धान्त आस्था और संस्कृतियों का मिलन है , जो कि उस निराकार परमात्मा की प्राप्ति के लिये दुनिआ को त्यागने या एकान्त प्राप्ति के लिये पहाड या वन मे जाने की आवश्यकता नही है।वरन रामाश्रम सत्संग ग्रहस्थ जीवन का पालन करते हुए समर्थ् सदगुरु की मदद से ईश्वर् प्राप्ति का मार्ग बताता है। इस सिद्धान्त को आगे करते हुए श्री राणाजी साहब् ने रामाश्रम श्यामनगर को अपनी कर्म स्थली के रूप मे चुना और जीवन पर्यन्त मानव मात्र की सेवा मे लगे रहे। पूज्य राणा जी साहब् ने परमार्थ् के प्रति अपनी सोच को अत्यधिक प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया जिसने आपको एक महान सूफ़ी संत के रूप मे गौरवान्वित किया।पूज्य राणाजी साहब् जी ने २० जून २०१० को १०२ वर्ष की आयु मे महा समाधि ले ली। राणा जी साहब् का समाधि मन्दिर श्री रामाश्रम मे बना हुआ है जो कि आज समस्त भारत वर्ष एवं विदेशों मे उनके अनुयायियों के बीच गहन श्रद्धा का केन्द्र है।राणा जी साहब् का समाधि मन्दिर एक बडे प्रागन के मध्य मे स्थित है।जहां आने वाले हर श्रद्धालु को एक अनिर्वचनीय आनन्द एवं शान्ति की प्राप्ति होती है।समाधि के साथ् मे लगा हुआ भवन् बना हुआ है, जो कि जीवन पर्यन्त श्री राणा जी का निवास् स्थान रहा है और श्रद्धालु साधकों के मध्य श्री राणा जी निवास् के नाम से लोकप्रिय है।श्री राणा जी निवास् मे साधकों के आवास, भोजन एवं अन्य आवश्यक सुविधायें उपलब्ध रहती हैं और देश विदेश के श्रद्धालु एवं साधक इस दिव्य स्थान पर आकर दिव्य आनन्द एवं गुरु कृपा से लाभान्वित होते हैं।
Thursday, September 1, 2011
Tuesday, May 31, 2011
प्रथम निर्वाण दिवस
पूज्य गुरुदेव का प्रथम निर्वाणदिवस ९,१०,११ जून २०११ को श्री रामाश्रम में आयोजित किया जा रहा है.श्री रामाश्रम की पुण्य भूमि पूज्य गुरुदेव की साधना स्थली और कर्म भूमि रही है जहाँ पर रह कर पूज्य गुरुदेव से अनगिनत लोग लाभान्वित हुए। और हर किसी को मिला पूज्य श्री का स्नेहिल और वात्सल्यमय प्यार.....एक अनिर्वचनीय एवं अवर्णनीय व्यक्तित्व जो कि हम सब के दिलो दिमाग में रच बस गया है।
यह हमारा अहो भाग्य होगा कि हम सब इस अवसर पर पूज्य गुरुदेव की दया कृपा से फैज्याब हों.उनके दर पर हम हाजिरी दे सकें.सम्मिलित हो सकें उस अमृत वर्षा में जो हब सबके लिए कल्याण कारी है.
यह हमारा अहो भाग्य होगा कि हम सब इस अवसर पर पूज्य गुरुदेव की दया कृपा से फैज्याब हों.उनके दर पर हम हाजिरी दे सकें.सम्मिलित हो सकें उस अमृत वर्षा में जो हब सबके लिए कल्याण कारी है.
Wednesday, September 1, 2010
Tuesday, June 29, 2010
श्रद्धांजलि समारोह, दिनांक ०५ जुलाई २०१०,श्री राणा जी निवास, श्री रामाश्रम श्यामनगर
परम पूज्य श्री साहब जी महाराज को समर्पित शांति पाठ,षोडश संस्कार एवं यज्ञ का आयोजन दिनांक ०५ जुलाई २०१० को महासमाधि, श्री राणा जी निवास,श्री रामाश्रम श्यामनगर, प्रतिपल पल स्मरणीय श्रद्धेय साहब जी की दिव्य उपस्थिति में आयोजित होगा। कार्यक्रम का औपचारिक प्रारंभ प्रातः ६ बजे से शांति पाठ से होगा और इसके समापन का संभावित समय दोपहर १२ से १ बजे अपरान्ह तक होगा.यह हम सब का परम पूज्य साहब जी प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने का सर्वोत्तम माध्यम होगा और अपनी अपनी पूज्य साहब के साथ की मधुर, अविस्मर्णीय स्मृतियों को पुनः उनकी दिव्य करुणामयी उपस्थिति के मध्य, उनको याद करने का दिव्य और दुर्लभ अवसर...उस परम दुर्लभ विभूति(जो भौतिक रूप से आज नहीं है परन्तु उनका वरदहस्त आज भी हम सब पर है) को सादर नमन करते हुए आप सभी को सादर आमंत्रण
सादर, श्री गुरु चरणों में
हम सब
Sunday, June 27, 2010
Thursday, April 29, 2010
परम पूज्य लाला जी साहब का वसीयतनामा

"अल्लाह पाक हमारी नीयतों को दुरुस्त फरमावे और हमारा अंजाम हमारे पेशवाओं और पीरानेउज्जाम के तरीके पर उनके एत्कादात के साथ हो.आमीन. आमीन."
जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है. न मालूम किस वक़्त सांस वापस न आये. इसलिए चन्द बातें बतौर वसीयत के एहितियातन लिख कर इस उम्मीद पर छोड़ता हूँ कि मेरे बाद मेरी सुल्वी व रूहानी औलाद, अगर अल्लाह ताला उनको तौफीक और हिम्मत अता फरमावे, तो उस पर कारबंद हों और तौफीक सिर्फ "उस" ही के हाथ में है.
(दस्तखत) फकीर रामचंद्र
२३ अक्टूबर, सन १९३० ईस्वी
वास्ते वरखुरदार जगमोहन नारायण के-
१.पहले ज़ज्ब और उसके बाद सुलूक के तरीके को तय करके तकमील के दर्जे तक पहुंचना चाहिए और यह काम सिर्फ तुम्हारे मुर्शद से ही निकलेगा. काश अगर तुमको मौका न मिले तो जब और जिस वक़्त इमदाद गैबी तुम्हारी तबियत को उभारे तो फिर तुम्हारे भाई ब्रज मोहन लाल (अल्लाह ताआला उसकी उम्र में बरक़त अता फरमावें) से ज्यादह शफ़क़त करने वाला नहीं मिलेगा. लाजिम है कि उसकी इताअत में फर्क न करना और दिल व जान से लग कर इस तरीके की तकमील हासिल कर लेना. मुझको भरोसा है कि वह अज़ीज़ तुम्हारे वास्ते कोई कसर नहीं रखेंगे.
२.जहाँ तक मुर्शदी व मौलाई ज़नाब हज़रात किबला का इशारा मुझको दिया गया है कि मेरी औलाद में बरखुरदार जगमोहन का पैदायशी अख़लाक़ दुरुस्त है और लतायफ़ में से लतायफ़ कल्ब तालीम से ही जाकिर है, लेकिन मेरी दानिस्त में ज़ज्बे की ज़ेहत उसकी नातमाम है. उसको हासिल करनी चाहिए.
वहबी अख़लाक़ और कसबी अख़लाक़ में फर्क है. वहबी में ज्यादह तालीम तलकीन की ज़रुरत नहीं होती. बर खिलाफ इसके कसबी में बहुत तजुरबों और मशक्कतों के बाद यह बात नसीब होती है,जिसमे अन्देशह गिरावट का भी रहता है.अल्हम्दलिल्लाह कि वहबी अख़लाक़ के लिए विशारद हज़रत क़िबला ने फरमाई. पीरन ए उज्ज़ाम के तुफैल में अल्लाह पाक इस नियामत के साथ उसका खैर अंजाम बखैर फरमावे.
अज़ीज़ मजकूर शूकराना इस नियामत का अदा करते रहें, और अपने आप को हमेशा आजिज़ समझें, क्योंकि नियामत का देने वाला मुख्तार है कि जब चाहता है, अपनी दी हुई नियामतों को वापस ले सकता है.
३.इस आजिज़ फकीर ने फल्सफह और मुख्तलिफ मजहबों के अकीदों की,जहाँ तक कि मेरे इल्म ने मुझको इमदाद की, छानबीन की लेकिन आखिर को पीरान-ए-उज्ज़ाम के एत्कादों और तरीकों को ऐसा पाया है कि जिन पर मजबूती के साथ कायम रहने से आखिर दम तक सलामती की उम्मीद है.
मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त तक उन तरीकों और एतकादों का पूरा पाबन्द जैसा कि चाहिए, नहीं रहा है. लेकिन दिल से इकरार ज़रूर रहा है. अफ़सोस कि अहबाब और मेरे साथ चलने वालों में से एक ने भी ऐसी हिम्मत नहीं की, कि इन एतकादों को कबूल भी करता.
इसमें सरासर कसूर मैंने अपना पाया है कि अब तक तहरीरी बयान एत्कादों का उनके रूबरू नहीं रखा; हालांकि ज़बानी हमेशा मौके-मौके पर ज़िक्र करता रहा हूँ.मालूम नहीं कि किन किन अहबाब ने उनको कबूल और मंज़ूर किया.
ज़ाहिर है औलाद ताक़त और कदी कामद में अपने बुजुर्गों से नस्ल बाद नस्ल कमज़ोर ही होती चली आ रही है.इसी तरह रूहानियत और अखलाकी बातों में भी रोज़मर्रा गिरावट हो सकती है, मगर यह कायदा कुल्लिया नहीं है. अल्लाह ताआला की कुदरत महदूद नहीं है. जब चाहे कभी ऐसा जवां मर्द कमज़ोर माँ-बाप से पैदा हो सकता है कि पांच सौ वर्ष पहले हुआ हो.
जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है. न मालूम किस वक़्त सांस वापस न आये. इसलिए चन्द बातें बतौर वसीयत के एहितियातन लिख कर इस उम्मीद पर छोड़ता हूँ कि मेरे बाद मेरी सुल्वी व रूहानी औलाद, अगर अल्लाह ताला उनको तौफीक और हिम्मत अता फरमावे, तो उस पर कारबंद हों और तौफीक सिर्फ "उस" ही के हाथ में है.
(दस्तखत) फकीर रामचंद्र
२३ अक्टूबर, सन १९३० ईस्वी
वास्ते वरखुरदार जगमोहन नारायण के-
१.पहले ज़ज्ब और उसके बाद सुलूक के तरीके को तय करके तकमील के दर्जे तक पहुंचना चाहिए और यह काम सिर्फ तुम्हारे मुर्शद से ही निकलेगा. काश अगर तुमको मौका न मिले तो जब और जिस वक़्त इमदाद गैबी तुम्हारी तबियत को उभारे तो फिर तुम्हारे भाई ब्रज मोहन लाल (अल्लाह ताआला उसकी उम्र में बरक़त अता फरमावें) से ज्यादह शफ़क़त करने वाला नहीं मिलेगा. लाजिम है कि उसकी इताअत में फर्क न करना और दिल व जान से लग कर इस तरीके की तकमील हासिल कर लेना. मुझको भरोसा है कि वह अज़ीज़ तुम्हारे वास्ते कोई कसर नहीं रखेंगे.
२.जहाँ तक मुर्शदी व मौलाई ज़नाब हज़रात किबला का इशारा मुझको दिया गया है कि मेरी औलाद में बरखुरदार जगमोहन का पैदायशी अख़लाक़ दुरुस्त है और लतायफ़ में से लतायफ़ कल्ब तालीम से ही जाकिर है, लेकिन मेरी दानिस्त में ज़ज्बे की ज़ेहत उसकी नातमाम है. उसको हासिल करनी चाहिए.
वहबी अख़लाक़ और कसबी अख़लाक़ में फर्क है. वहबी में ज्यादह तालीम तलकीन की ज़रुरत नहीं होती. बर खिलाफ इसके कसबी में बहुत तजुरबों और मशक्कतों के बाद यह बात नसीब होती है,जिसमे अन्देशह गिरावट का भी रहता है.अल्हम्दलिल्लाह कि वहबी अख़लाक़ के लिए विशारद हज़रत क़िबला ने फरमाई. पीरन ए उज्ज़ाम के तुफैल में अल्लाह पाक इस नियामत के साथ उसका खैर अंजाम बखैर फरमावे.
अज़ीज़ मजकूर शूकराना इस नियामत का अदा करते रहें, और अपने आप को हमेशा आजिज़ समझें, क्योंकि नियामत का देने वाला मुख्तार है कि जब चाहता है, अपनी दी हुई नियामतों को वापस ले सकता है.
३.इस आजिज़ फकीर ने फल्सफह और मुख्तलिफ मजहबों के अकीदों की,जहाँ तक कि मेरे इल्म ने मुझको इमदाद की, छानबीन की लेकिन आखिर को पीरान-ए-उज्ज़ाम के एत्कादों और तरीकों को ऐसा पाया है कि जिन पर मजबूती के साथ कायम रहने से आखिर दम तक सलामती की उम्मीद है.
मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त तक उन तरीकों और एतकादों का पूरा पाबन्द जैसा कि चाहिए, नहीं रहा है. लेकिन दिल से इकरार ज़रूर रहा है. अफ़सोस कि अहबाब और मेरे साथ चलने वालों में से एक ने भी ऐसी हिम्मत नहीं की, कि इन एतकादों को कबूल भी करता.
इसमें सरासर कसूर मैंने अपना पाया है कि अब तक तहरीरी बयान एत्कादों का उनके रूबरू नहीं रखा; हालांकि ज़बानी हमेशा मौके-मौके पर ज़िक्र करता रहा हूँ.मालूम नहीं कि किन किन अहबाब ने उनको कबूल और मंज़ूर किया.
ज़ाहिर है औलाद ताक़त और कदी कामद में अपने बुजुर्गों से नस्ल बाद नस्ल कमज़ोर ही होती चली आ रही है.इसी तरह रूहानियत और अखलाकी बातों में भी रोज़मर्रा गिरावट हो सकती है, मगर यह कायदा कुल्लिया नहीं है. अल्लाह ताआला की कुदरत महदूद नहीं है. जब चाहे कभी ऐसा जवां मर्द कमज़ोर माँ-बाप से पैदा हो सकता है कि पांच सौ वर्ष पहले हुआ हो.
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